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आजादी आंदोलन एवं टिहरी राजशाही सामंती शासन के खिलाफ विद्रोह करने वाले अग्रणी नेताओं में शुमार थे नागेन्द्र दत्त उनियाल

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आजादी आंदोलन एवं टिहरी राजशाही सामंती शासन के खिलाफ विद्रोह करने वाले अग्रणी नेताओं में शुमार थे नागेन्द्र दत्त उनियाल

टिहरी राजशाही सामंती शासन के खिलाफ चले आंदोलन में जहां श्रीदेव सुमन, नागेन्द्र सकलानी, मोलू भरदारी, दादा दौलत राम आदि आंदोलनकारियों को ही जहां आज आम जनमानस जानता है वहीं, शायद कम ही लोगों को ज्ञात हो कि आजादी आंदोलन एवं टिहरी राजशाही सामंती शासन के खिलाफ चले आंदोलन में ढुण्डसिर कड़ाकोट के थापली गांव निवासी स्वतंत्रता संग्राम सैनानी नागेन्द्र दत्त उनियाल पुत्र श्री आत्माराम उनियाल का भी प्रमुख योगदान रहा है।

इस आंदोलन में करीब सात माह से अधिक समय तक जेल में रहने के बाद राजशाही के खात्मे के लिए निर्णायक लड़ाई में स्व0 नागेन्द्र दत्त उनियाल का अहम योगदान रहा। यही नहीं अमर शहीद श्रीदेव सुमन के साथ जेल में हड़ताल करने वालों में भी यह प्रमुख रूप से शामिल रहे।

टिहरी जिले के विकासखण्ड कीर्तिनगर के ग्राम पंचायत थापली ढुण्डसिर में जन्मे नागेन्द्र उनियाल के मन में बाल्यकाल से ही देश-प्रेम की भावना कूट-कूट के भरी हुई थी। घर में जब कई बार महीनों तक बाहर रहने और आंदोलनों में शामिल होने पर घर के परिजनों के साथ अक्सर उनकी बोलचाल हो जाती थी। एक बार उन्होंने अपने पिता से बोला कि आपका एक पुत्र और है यदि मैं देश के लिए बलिदान भी हो जाऊं तो कोई दिक्कत नहीं है।

देश के आजादी आंदोलन के दौरान 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में दिल्ली, ग्वालियर, मेरठ, देहरादून आदि शहरों में श्री उनियाल द्वारा विभिन्न कार्यक्रमों में भागीदारी की गई। आजादी आंदोलन के दौरान जवाहर लाल नेहरू के साथ वह देहरादून जेल में भी रहे।

कीर्तिनगर में गोलीकांड 11 जनवरी 1949, को थाना जलाया गया था तब हुए संघर्ष में सकलानी और भरदारी के शव को लेकर टिहरी ले जाने वालों में यह शामिल थे। 1944 में श्रीदेव सुमन के साथ जेल की हड़ताल में शामिल थे। परिपूर्णानंद पैन्यूली टिहरी जेल से जब भागे तो इनकी पंखी लेकर गए थे। उन्हें इन्होंने ही भगाने में सहयोग किया।

टिहरी आजाद होने के बाद वह गांव में अपने साथियों से आंदोलनों के दौरान जेल में दी जाने वाली यातनाओं का जिक्र कर बताते थे कि जेल में उन्हें बाजरा की रोटी दी जाती थी जिसमें भी कांच मिला होता था। रात में राजा के सिपाही उन्हें यातनाएं देते थे।

आजादी के बाद घर में खाने के भी लाले पड़ गए थे क्योंकि आजीविका का कोई साधन नहीं था। अपने पिता के साथ जब थे तो काम चल जाता था लेकिन जब दोनों पुत्रों को अलग-अलग कर दिया तो फिर बगैर आजीविका के घर चलाना मुश्किल हो गया। वर्तमान में सरकार से पेंशन के अलावा और कोई सुविधा नहीं ली। पेंशन भी नहीं ले रहे थे लेकिन परिजनों के दवाब में आने पर पेंशन लेने के लिए सहमत हुए।

जेल (टिहरी एवं देहरादून) का सफर

29 जुलाई 1946 से 28 फरवरी 1947
20 अगस्त 1947 से 29 अगस्त 1947 तक

अब तक मिले पुरस्कार

15 अगस्त 1972 में श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा ताम्र पत्र दिया गया।
6 नवंबर 1973 को उत्तर प्रदेश के राज्यपाल द्वारा सम्मानित किया गया।
उत्तराखण्ड राज्य की प्रथम वर्षगांठ पर श्रीमती सतेश्वरी देवी धर्मपत्नी स्व. नागेन्द्र दत्त उनियाल को मुख्यमंत्री श्री भगत सिंह कोश्यारी द्वारा सम्मानित किया गया।
श्रीनगर अस्पताल 1974 – आंदोलन के दौरान पैर पर चोट लगी, सामान्य ढंग से भर्ती थे जब मिलने आए परिपूर्णानंद पैन्यूली, हेमवतीनंदन बहुगुणा एवं प्रणव मुखर्जी तो पता चला कि यह आंदोलनकारी हैं तब जाकर उन्हें सही ढंग से वीआईपी उपचार मिला।

कुर्की वारंट- टिहरी से आया, दादा ने बोला कि यह है इसका मकान तब ताले लगे। दादा, दादी, मां टिहरी जेल गए। राजा के सिपाही ने बोला कि बाहर आओ और माफी मांगों लेकिन तब वह बाहर नहीं आए।

सुविधाएं नहीं ली- जमीन, बस का परमिट आदि कोई भी सुविधा नहीं ली।

आजादी के इस पावन पर्व पर आज सभी लोगों को देश के ऐसे महान नायकांें से प्रेरणा लेने की जरूरत है। तभी हम असल तौर पर आजादी के मायनों को समझ पाएंगे और तभी स्वतंत्रता संग्राम के सैनानियों के सपने का भारत बनने का मार्ग प्रशस्त होगा। ऐसे वीर स्वतंत्रता संग्राम सैनानी को नमन।

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