बीते दो-तीन वर्षों में दुनिया एक बार फिर से उन बीमारियों का डर महसूस कर रही है, जिन्हें कभी लगभग खत्म मान लिया गया था। मम्प्स और मीजल्स जैसे संक्रमण के प्रकोप ने जहां बच्चों की सेहत को गंभीर रूप से प्रभावित किया वहीं अब वैज्ञानिक एक और बढ़ते खतरे को लेकर सभी लोगों को अलर्ट कर रहे हैं। हालिया रिपोर्ट्स में विशेषज्ञों ने यूनाइटेट किंगडम (यूके) सहित कई देशों में पोलियो के खतरे को लेकर लोगों को सावधान किया है।
पोलियो (पोलियोमाइलाइटिस) एक अत्यधिक संक्रामक बीमारी है, जो पोलियोवायरस के कारण होती है। यह वायरस तंत्रिका तंत्र पर अटैक करता है और मुख्य रूप से 5 साल से कम उम्र के बच्चों को प्रभावित करता है। इससे बच्चों में लकवा, विकलांगता या मृत्यु तक का खतरा हो सकता है। जिन स्थानों पर पोलियो का एक भी मामला होता है वहां स्थानीय बच्चों में इस बीमारी का खतरा काफी बढ़ जाता है।
कोविड महामारी के विशेषज्ञों की एक टीम ने एक जनरेशन में पहली बार यूके में पोलियो के बड़े पैमाने पर फैलने के खतरे को लेकर अलर्ट किया है। विशेषज्ञों ने कहा, ये मामले हाई लेवल पर जा सकते हैं। यूके के साथ कई अन्य देशों को भी इस बढ़ते खतरे को लेकर अलर्ट किया गया है।
वैक्सीनेशन की कमी फिर बढ़ा रही पोलियो का खतरा
मम्प्स और मीजल्स के बढ़ते मामलों के लिए विशेषज्ञों ने कोविड महामारी के दौरान वैक्सीनेशन की दर में गिरावट को प्रमुख कारण पाया था। पोलियो आउटब्रेक के लिए भी वैज्ञानिक टीकाकरण की दरों में गिरावट और वैश्विक उन्मूलन कार्यक्रम के लिए फंडिंग खत्म करने के सरकार के फैसले को जिम्मेदार बता रहे हैं।
- विशेषज्ञों ने कहा, यूके के साथ कई अन्य देशों में भी इस रोग के मामले बढ़ने की आशंका है।
- इसे वेक अप कॉल के तौर पर लिया जाना चाहिए, वरना हम फिर उसी दौर में पहुंच जाएंगे जहां से बड़ी मुश्किल से दुनिया निकल पाई थी।
- टीके को लेकर लोगों में हिचकिचाहट और लापरवाही के चलते हर पांच में से एक बच्चे को पोलियो का प्री-स्कूल टीका नहीं लग पा रहा है, जिससे वे खतरे में पड़ गए हैं।
गौरतलब है कि यह वायरस अक्सर हल्के फ्लू जैसे लक्षण पैदा करता है, हालांकि समय के साथ यह मस्तिष्क और नसों को प्रभावित करने वाली गंभीर समस्याओं का कारण बन जाता है। इससे बच्चों में लकवा, मस्तिष्क से संबंधित समस्याओं और मृत्यु के खतरा भी बढ़ जाता है।
गाजा में पोलियो टीकाकरण पर काम के लिए ‘किंग्स ह्यूमैनिटेरियन मेडल’ से सम्मानित डॉ. डी सिल्वा कहते हैं-
”मैंने गाजा में पोलियो पर काम करने के दौरान देखा है कि यह बीमारी कैसे दोबारा लौट सकती है। यह कुछ घंटों या दिनों के भीतर हो सकता है और आमतौर पर पैरों को प्रभावित करता है। यदि लकवा सांस लेने वाली मांसपेशियों को प्रभावित करता है तो यह जानलेवा भी हो सकता है। टीकाकरण की दरों में गिरावट और हाल ही में फंडिंग में की गई कटौती के चलते, पोलियो का खतरा एक पीढ़ी से भी ज्यादा के समय में पहली बार अपने सबसे ऊंचे स्तर पर है।”
- वैश्विक पोलियो उन्मूलन के लिए फंडिंग खत्म करने का फैसला दूरदर्शिता की कमी को दर्शाता है।
- खासकर तब, जब हमें हाल के वर्षों में सीवरों में इस बीमारी के दोबारा उभरने के संकेत मिले हैं।
- जब तक पोलियो दुनिया में कहीं भी मौजूद है, तब तक यह हर जगह के लिए खतरा बना रहेगा।
नेशनल हेल्थ सर्विस (एनएचएस) के अनुसार, यूके में पोलियो का आखिरी मामला साल 1984 में सामने आया था, जिसके बाद से व्यापक टीकाकरण के जरिए बच्चों को इस बीमारी से सुरक्षित कर लिया गया। यूके को साल 2003 में पोलियो मुक्त घोषित कर दिया गया था।
लेकिन डॉक्टरों को इस बात का डर है कि फंडिंग में कटौती और टीकाकरण की दरों में गिरावट के चलते यह बीमारी दोबारा उभर सकती है। फंडिंग और वैक्सीनेशन ‘हर्ड इम्यूनिटी’ बनाए रखने के लिए जरूरी है।
डॉ. डी सिल्वा ने आगे कहा, अंतरराष्ट्रीय फंडिंग में कटौती करने का यूके सरकार का फैसला वैश्विक टीकाकरण कार्यक्रमों पर काफी गहरा असर डालेगा। इससे पीढ़ियों की मेहनत बेकार हो सकती है, और इस बीमारी को पूरी तरह से खत्म करने का मौका हाथ से निकल सकता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के मुताबिक अब पोलियो दुनिया के केवल दो ही देशों-पाकिस्तान और अफगानिस्तान में ही एंडेमिक है।
डब्ल्यूएचओ के यूरोपीय क्षेत्र को साल 2002 में पोलियो मुक्त घोषित किया गया था। भारत भी साल 2011 में इस बीमारी से मुक्त हो चुका है। 13 जनवरी 2011 को पश्चिम बंगाल में संक्रमण का आखिरी केस रिपोर्ट किया गया था। 27 मार्च 2014 को विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने भारत को पोलियो-फ्री घोषित कर दिया।

