वो गांव की दुकान

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वो गांव की दुकान

नीरज नैथानी

गर्मियों की छुट्टी में अक्सर गांव जाना‌ होता था। मेरा एक छोटा किंतु खूबसूरत सा पहाड़ी गांव है। गांव तक जाने के लिए मुख्य मोटर मार्ग से ऊपर तक दो ढाई किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई का पैदल रास्ता है। 

वह पहाड़ी पगडण्डी चीड़ के जंगलों से होकर गुजरती है। मुख्य सड़क व गांव के रस्ते के बीच में एक समतल भाग‌ है। यहां पर बहुत पुराने समय से इंटर कॉलेज की‌ बिल्डिंग बनी हुई है।

पास में ही एक कच्चे मकान पर छोटी सी दुकान है। भौगोलिक आकार में छोटे होते हुए भी वह कई मामलों में बहुत बड़ी कही जा सकती है।

मसलन वह अनेक प्रकार की गतिविधियों का केंद्र बनी रहती है। हांलाकि जून महीने में स्कूल का स्टाफ, टीचर्स तथा विद्यार्थी छुट्टी होने के कारण वंहा नहीं दिखते। 

लेकिन जुलाई में स्कूल खुलने पर उस निर्जन इलाके की रौनक बहुत बढ़ जाती है यह मेरे चचेरे भाई व गांव के दोस्त बताते। लेकिन इससे आप यह अनुमान मत लगा बैठिएगा कि जून महीने में उस इलाके में सन्नाटा पसर जाता होगा।

जो लोग शहर से गांव आते वे सड़क से ऊपर चढ़ाई चढ़ते हुए थकान मिटाने के लिए कुछ देर इस दुकान में जरूर रुकते, इसी तरह जब गांव का कोई आदमी ऊपर गांव से नीचे सड़क पर आ रहा होता तो सुस्ताने के लिए यंहा रुकता ही रुकता।तो मैं दुकान की बात कर रहा था। लाला जी गांव के रिश्ते से मेरे काका लगते थे मेरे ही क्या गांव के अधिकांश दोस्त उन्हें जग्गू काका ही कहकर संबोधित करते थे।

जग्गू काका का सारे इलाके में नाम था। हमारे गांव के अलावा आस पास के अनेक गांव वालों के लिए जग्गू काका की दुकान केवल एक छोटी दुकान भर नहीं थी वरन् सुपर मार्केट, शॉपिंग मॉल या डिपार्टमेंटल स्टोर, बाजार सभी कुछ था। उस दुकान में अंदर जाने पर मेरे नथुनों में एक विचित्र सी गंध भर जाती थी। वह कभी ग्लूकोज ब्रिटानिया बिस्कुट की खुशबू लगती तो कभी टॉफी की तो कभी लेमनचूस की गोलियों की तो कभी चूरन की खट्टी मीठी पुड़ियों की या कभी सनलाइट, लक्स साबुन की।

हां दुकान के अंदर कॉलगेट पेस्ट व पाउडर की भी भीनी भीनी खुशबू भी तैरती महसूस होती। धूप अगर बत्ती के अलावा तम्बाकू पिण्डी की गंध, मिट्टी तेल के कनस्तर की गंध, मिर्च मसालों की गंध, दाल, चावल, आटा, भेसन, सूजी, चीनी, गुड़, भेल्ली की गंध इसके अलावा सौंफ, जीरा, नमक, अजवाइन की गंध भी फैली रहती। एक कोने में रखे प्याज, लहसुन आलू के बोरों से भी एक अलग किस्म की महक आती रहती।

अलावा इसके बच्चों के लिए कॉपी, पेन, पेंसिल, चाक, खड़िया, स्लेट, स्याही, गोंद, रंगीन कागज, गत्ता भी वहां मिलते। जग्गू काका की दुकान की रैक में स्कूल के बच्चों के लिए सफेद पी टी शू के साथ ही चमड़े के जूते व गरीब ग्राहकों के लिए रबर प्लास्टिक की चप्पल सैंडल के डिब्बे भी खुंसे रहते।

कहने का मतलब उस छोटी सी दुकान में जरूरत का सब कुछ सामान मिलता। आपको एवरेडी टॉर्च चाहिए तो जग्गू काका के यंहा मिलेगी, आपको लैम्प, कुप्पी लालटेन चाहिए मिल जाएगी। आप मोमबत्ती, माचिस, रुंई, धूप अगर बत्ती क्या लेना चाहते हैं भाई, सभी कुछ एक ही जगह पर एक ही दुकान में, हां जी, जग्गू काका की दुकान में मिलेगा।

लोग पैजामें के लिए कपड़ा लेने आते, कच्छों के लिए लठ्ठे वाला सूती कपड़ा, मारकीन, लड़कियों के लिए सलवार कुर्ते का कपड़ा, यहां तक कि गांव में शादी बरात में लेन देन के लिए लेडीज की धोतियां, पेटीकोट, ब्लाउज क्या नहीं मिलता था उस दुकान में।

सुंई, धागा, बटन, नाड़ा, सुतली, रस्सी, डोरी, थैले, छाते, गिलास, कप, प्लेट, कटोरी, थाली, परात, चिमटा, तवा, बेलन, चकुला, कर्ची, भड्डू, कढ़ाई, अंगीठी, तसला------क्या क्या गिनाया जाय, सामानों की सूची लम्बी होती चली जाएगी। दुकान बहुत बढ़िया चलती काका की। लेकिन जग्गू काका अक्सर हर किसी से यही कहते, सही बात तो यह है कि इस दुकान से मैंने इतना कमाया नहीं है जितना गंवा दिया। लोग उधार ले जाते हैं फिर चुकाने का नाम नहीं लेते।

उधारबाजी है भी अपने ही गांव वालों की सभी नाते रिश्तेदार हैं किस किससे लड़ने जाऊं।फिर सोचता हूं छोड़ो समझ लो कि दान कर दिया। सुबह होते ही जग्गू काका दुकान खोलकर अंदर व बाहर झाड़ू सफाई शुरु कर देते।फिर दुकान के बाहर बरामदे में दोनों ओर दो खाली कनस्तर रख कर उनके ऊपर पटरा रख देते इस तरह वह बैठने के लिए बेंच बन जाती।

ग्राहकों के अलावा बल्कि ज्यादातर गपशप मारने वाले इन पर बैठकर बतियाते।कुछ पास के तप्पड़ में दिन भर सीप खेलते। ये बना नौ का घर, ये लूटा बादशाह, ये निकला सत्ता, चल निकाल ग्यारह, ये लगी सीप जैसे शब्द हवा में गूंजते रहते। बीच बीच में जग्गू काका को चार की छह चाय बनाने का आर्डर भी मिलता। वे साइड में रखे स्टोव को पम्प मारकर भभकारे से जलाते व केतली चढ़ा देते।

कभी कभार फ्राईपैन में अंडे की भुजिया या आमलेट भी बनाते। कोई फौजी कैंटीन से सामान लेकर जब गांव लौट रहा होता तो कई लपक कर उसकी खुशामद करते यार भैजी एक दे दे । फिर वे दुकान की बगल में खाली पड़ी जगह पर बोरा बिछाकर दावत उड़ाते। नमकीन पुड़िया, बीड़ी, सिगरेट, भुजिया सब जग्गू काका की दुकान से आता। अगर कोई फौजी नहीं टकरता तो ये पियक्कड़ जग्गू काका से खुशामद करते देख काका कोई पड़ी होगी अंदर तेरी दुकान में।

तब जग्गू काका खूब खुशामद किए जाने पर बढ़े दाम के साथ मोटा मुनाफा कूटते हुए उन्हें दे देता साथ में उन्हीं के हिस्से से दो पैग भी हासिल करता व एहसान अलग से जताता। अलावा इसके जग्गू काका के ट्रांजिस्टर को घेर कर कमेंट्री सुनना या कोई महत्वपूर्ण घटना हो जाने पर खबर सुनते हुए बहस बाजी करना भी लोगों का शगल हुआ करता। वैसे वह ट्रांजिस्टर दिन भर ही बजता ही रहता। गाने, कृषि जगत, चौपाल सभी कुछ चलता रहता।

कुल मिलाकर जग्गू काका की वह दुकान दिखने से आकार में छोटी सी जरूर लगती परंतु उसका क्रियात्मक क्षेत्र बहुत विस्तृत था।खेलकूद, धमाचौकड़ी, बहसबाजी, चर्चा परिचर्चा, ज्ञान विज्ञान, दुनिया भर की बातें, सारे जहां की खबरें, मिलन केंद्र, मनोरंजन स्थली, समाचार बुलेटिन जैसी तमाम सारी गतिविधियों की वजह से जग्गू काका की दुकान आसपास के क्षेत्र में हर किसी की जुबान पर रहती। सच बात यह है कि केवल हमारे गांव ही नहीं वरन आसपास के इलाके में जग्गू काका का जितना नाम शोहरत है वह केवल और केवल उस दुकान की वजह से ही है।

वास्तव में छोटी होते हुए भी बहुत बड़ी है मेरे गांव की वह दुकान।

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