श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत की तिथि को लेकर आपको यदि कोई असमंजस है तो चिंता की कोई बात नहीं है। यहां हम आपको इस बारे में जानकारी दे रहे हैं। इस वर्ष श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत का पर्व स्मार्त और वैष्णव भेद से दो दिन आ रहा है। इस व्रत के सम्बन्ध में दो मत प्रचलित हैं।

स्मार्त लोग यानि सामान्य गृहस्थी लोग जब सप्तमी युता अष्टमी होती है और रात्रि भर अष्टमी तिथि होती है तब व्रत को करते हैं। क्योंकि इनके अनुसार भगवान श्री कृष्ण जी का अवतार अर्धरात्रि के समय अष्टमी तिथि में हुआ था। जबकि वैष्णव मतालम्बी अर्धरात्रि अष्टमी की उपेक्षा करके नवमी विद्धा अष्टमी में व्रत करने में विश्वास रखते हैं। यानि कि वह जन्म के बाद व्रत त्यौहार मनाते हैं। यह “धर्मसिन्धू” मे स्पष्ट है।

पं० प्रकाश उनियाल के मुताबिक अधिकांश शास्त्रकारों ने अर्धरात्रि अष्टमी में ही व्रत पूजन एवं उत्सव मनाने की पुष्टि की है। श्रीमद्भागवत महापुराण, श्री विष्णु पुराण, वायु पुराण, अग्नि पुराण, भविष्यपुराण भी अर्धरात्रि युक्ता अष्टमी में ही भगवान के जन्म की पुष्टि करते हैं। इस प्रकार सिद्धांत रुप में अर्धरात्रि व्यापिनी अष्टमी तिथि ही मान्य है। केवल मथुरा वृन्दावन में जन्म के बाद जन्माष्टमी व्रत त्यौहार मनाते हैं ।

इस वर्ष 11 अगस्त २०२० मंगलवार को प्रातः 9 बजकर 07 मिनट तक ही सप्तमी तिथि है। उसके बाद अष्टमी तिथि लग जायेगी। जो कि रात भर रहेगी। और अगले दिन 12 अगस्त २०२० बुधवार को प्रातः 11 बजकर 17 मिनट तक रहेगी। इसलिये जो गृहस्थी लोग हैं यानि कि स्मार्त लोग हैं उन्हें श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 11 अगस्त मंगलवार को ही व्रत त्यौहार मनाना चाहिए।

वास्तव में देखा जाय तो श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत तथा जन्मोत्सव दो अलग-अलग स्थितियां हैं। व्रत जन्म के दिन और जन्मोत्सव जन्म के बाद मनाया जाता है। इसलिये 11 अगस्त २०२० मंगलवार के दिन ही श्री कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत, चन्द्रमा का अर्घ दान, जागरण भजन कीर्तन आदि सभी कार्य करना श्रेयस्कर रहेगा।

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