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Tuesday, April 13, 2021
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World Sparrow Day: अब कम ही दिखाई देती है घर-घर आंगन में चहकने वाली गौरैया

आज विश्व गौरैया दिवस है। उत्तराखंड में कुछ सालों पहले गांव एवं घरों में गौरैया की तादाद काफी संख्या में देखने को मिलती थी, लेकिन अब घर-घर आंगन में चहकने वाली गौरैया कम ही दिखाई देती है। उत्तराखंड में इनकी पांच प्रजातियों पर संभवतया संकट है। यह तब है जबकि उत्तराखंड को चिड़ियाओं के संसार के रूप में भी देखा जाता है। यहां चिड़ियाओं की करीब 700 प्रजातियां हैं।

गौरैया शहरी क्षेत्रों में भी दिखाई दे जाती है, लेकिन अब इनकी संख्या में कमी आ रही है। लंबे समय से शहरों में रह रहे लोग इसकी पुष्टि कर रहे हैं। वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक बिना सर्वे के यह कहना मुश्किल है कि गौरैया की संख्या कम हो रही है, इतना जरूर है कि गौरैया का शहरों में दिखना कम हो गया है।

मुख्य वन्य जीव प्रतिपालक जेएस सुहाग के मुताबिक आप कस्बों की तरफ निकल जाइए, आपको गौरैया सहित कई पक्षी दिखाई देंगे। शहरों में लोगों का ध्यान गौरैया की तरफ कम जाता है और यही वजह है कि मान लिया जाता है कि गौरैया की संख्या कम हो रही है, इसके लिए एक सर्वे जरूरी है।

यह मामला गौरैया की तरह नाजुक तितलियों जैसा ही है। प्रदेश में तितलियों की करीब 576 प्रजातियां पाई जाती हैं, लेकिन शहरों में शायद ही आप किसी तितली को महीनों में देख पाते हों। जलवायु परिवर्तन और आबो हवा में बदलाव भी एक वजह हो सकती है कि तितलियों और पक्षियों ने अपने लिए नए आसरे ढूंढ लिए हों।

वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक पिछले कुछ समय से गौरैया को लेकर लोगों की जागरूकता में इजाफा हुआ है। शहरों में लोग चिड़ियाओं के लिए घोंसले लगा रहे हैं। वन विभाग की ओर से भी इस तरह के घोंसले उपलब्ध कराए जाते हैं और इनकी मांग बढ़ रही है।

गौरैया संरक्षण के मामले में मक्कूमठ है मिसाल

शोर शराबा अगर कम हो तो गौरैया घर के किसी कोने में अपना घोंसला बना लेती है। रुद्रप्रयाग जिले के मक्कूमठ गांव में तीन साल पहले लोगों ने अपने मकानों में गौरैया के लिए छोटे-छोटे कंक्रीट के घर बनाने की शुरुआत की, यह मुहिम आज भी जारी है। बताया जाता है कि यहां अच्छी खासी तादात में गौरेया देखने को मिल जाती हैं।

मक्कूमठ गांव के पक्षी विशेषज्ञ यशपाल सिंह नेगी ने बताया कि वह पिछले कई वर्षों से इसके संरक्षण के काम में लगे हुए हैं। उन्होंने स्वयं के घर में जहां 33 घोसलें बनाए हैं वहीं गांव में अन्य लोगों को भी इसकी प्रेरणा देने के बाद करीब 125 घोसलें ग्रामीणों ने भी बनाए हैं।

कई नेशनल पार्क, आद्र भूमि और 70 प्रतिशत वन भूमि होने के बाद भी प्रदेश में चिड़ियाओं पर संकट कम नहीं है। राज्य पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से जारी स्टेट एनवायरमेंट रिपोर्ट के मुताबिक आईसीयूएन की रेड लिस्ट में उत्तराखंड के पक्षियों की करीब 45 प्रजातियां सूचीबद्ध हैं।

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