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Tuesday, June 22, 2021
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सुदंर लाल बहुगुणा: जब पदमश्री पुरस्कार लेने से कर दिया था इनकार

प्रख्यात पर्यावरणविद पद्मविभूषण सुंदर लाल बहुगुणा (94) का कोरोना से एम्स ऋषिकेश में निधन हो गया। वह आठ मई से कोरोना संक्रमण के चलते एम्स ऋषिकेश में भर्ती थे। स्वाधीनता आंदोलन, टिहरी राजशाही आंदोलन, चिपको आंदोलन, शराबबंदी आंदोलन, टिहरी बांध विरोधी आंदोलन के प्रणेता रहे स्व. बहुुगुणा ने देश-दुनिया में नाम कमाया था। उनके निधन से टिहरी ही नहीं बल्कि उत्तराखंड और भारत को अपूरणीय क्षति हुई है।

सुंदर लाल बहुगुणा का जन्म ऐतिहासिक पुरानी टिहरी से 12 किमी दूरी पर भागीरथी नदी के पास थौलधार ब्लॉक के मरोड़ा गांव में 9 जनवरी 1927 को हुआ था। उनके पिता अम्बादत्त बहुगुणा टिहरी रियासत के वनाधिकारी थे। महज 13 साल की उम्र में अमर शहीद श्रीदेव सुमन के संपर्क में आने के बाद उनके जीवन की दिशा ही बदल गई। सुमन से प्रेरित होकर वह बाल्यावस्था में ही आजादी के आंदोलन में कूद गए थे। उन्होंने टिहरी रियासत के खिलाफ भी आंदोलन चलाया। कुशाग्र बुद्धि के धनी सुंदरलाल की शिक्षा-दीक्षा राजकीय प्रताप इंटर कालेज टिहरी से लेकर लाहौर तक हुई।

टिहरी से लेकर लाहौर तक हुई शिक्षा-दीक्षा

1947 में लाहौर से बीए ऑनसज़् की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर टिहरी लौटने पर वह टिहरी रियासत के खिलाफ बने प्रजा मंडल में सक्रिय हो गए। 14 जनवरी 1948 को राजशाही का तख्ता पलट होने के बाद वह प्रजामंडल की सरकार में प्रचार मंत्री बने। जन संघर्ष के हितैषी बहुगुणा ने 1981 में पेड़ों के कटान पर रोक लगाने की मांग को लेकर पदमश्री लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने शराब बंदी, पर्यावरण संरक्षण और टिहरी बांध के विरोध में 1986 में टिहरी बांध के खिलाफ आंदोलन शुरू कर 74 दिन तक भूख हड़ताल की। मंदिर में हरिजनों का प्रवेश से लेकर बालिकाओं को शिक्षा दिलाने में उनका अहम योगदान रहा है।

पर्यावरण संरक्षण के लिए आंदोलन चलाने पर बहुगुणा को संयुक्त राष्ट्र संघ में बोलने का मौका मिला। जीवन भर समाज हित के लिए लडऩे वाले सुंदरलाल बहुगुणा को कई पुरस्कारों से नजावा गया। हालांकि 1981 में जंगलों के कटान पर रोक लगाने की मांग को लेकर उन्होंने पदमश्री पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया था। उसके बाद केंद्र सरकार समुद्रतल से 1000 मीटर से ऊंचाई वाले इलाकों में वृक्ष कटान पर पूरी तरह से रोक लगा दी। जिससे उत्तराखंड के पर्यावरण को लाभ मिला।

बीबीसी ने उन पर बनाई  ‘एक्सिंग द हिमालय’ फिल्म

बहुगुणा ने पर्यावरण संरक्षण के लिए जनमानस को जागरुक करने के लिए उत्तराखंड को पैदल नापकर कश्मीर से कोहिमा तक और गंगा संरक्षण के लिए गोमुख से गंगा सागर तक साइकिल यात्रा भी निकाली। बहुगुणा के समाज हित और पर्यावरण संरक्षण के लिए चलाए गए आंदोलन से प्रेरित होकर बीबीसी ने उन पर ‘एक्सिंग द हिमालय’ फिल्म भी बनाई। जीवन में समाज और पर्यावरण हित के लिए संघर्ष करने वाले बहुगुणा को कई पुरस्कार से नवाजा गया।

सुंदर लाल बहुगुणा को मिले पुरस्कार और सम्मान

वर्ष1981 पद्मश्री (इसे बहुगुणा ने नहीं लिया)
वर्ष 1986 जमनालाल बजाज पुरस्कार
वर्ष1987 राइट लाइवलीहुड अवार्ड
वर्ष1989 आईआईटी रुड़की द्वारा डीएससी की मानद उपाधि
वर्ष 2009 पद्मविभूषण इसके अलावा राष्ट्रीय एकता पुरस्कार, शेरे कश्मीर अवार्ड समेत दर्जनो अन्य छोटे बड़े पुरस्कार भी इन्हें दिए गए। विश्वभारती विवि शांतिनिकेतन ने भी इन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि प्रदान की।

बहुगुणा को केंद्र सरकार ने वनों के प्रति जागरूकता जगाने के लिए वर्ष 1981 में पद्मश्री देने की घोषणा की लेकिन उन्होंने उसे विनम्रता पूवर्क यह कहते हुए लेने से इनकार कर दिया कि जब तक वृक्षों की कटाई पर रोक नहीं लगती इसे लेने का कोई औचित्य नहीं है। बाद में केंद्र सरकार ने समुद्रतल से 1000 मीटर से ऊंचाई वाले इलाकों में वृक्ष कटान पर पूरी तरह से रोक लगा दी।

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