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Monday, June 14, 2021
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धान की रोपाई : जहां धान उगता था वहां उग आए हैं मकान

पुष्कर रावत
उत्तराखंड के पहाड़ों में धान की रोपाई और खेती पर आलेख का ये दूसरा हिस्सा है। पहले हिस्‍से में अत्‍यधिक लंबी पोस्ट से बचने के फेर में कुछ महत्वपूर्ण इलाकों की जानकारी छूट गई थी। मसलन, उत्त‍रकाशी जिले में डुण्डा से थाती धनारी मार्ग पर ऐतिहासिक सेरे हैं। धनारी पट्टी का नाम धान से ही उपजा लगता है। यहां धनपति गाड़ से सिंचित सेरों के साथ ही कुछ उंचाई पर उखड़ी लाल धान कभी बहुत प्रसिद्ध था। इसी वजह से श्रीनगर राजवंश के परिवार के सदस्यों को यहां खेती के लिए भूमि दी जाती थी।

उत्तरकाशी जिले के राड़ी डांडा के जंगलों से घिरा भंडारस्यूं क्षेत्र है। जहां अलग ही रंगत वाली मिट़टी है। कभी इसे टिहरी रियासत का भंडार कहा जाता था। यहां लोगों के कोठारों में दो तीन साल के लिए अन्न सुरक्षित रखा जाता था। इसीलिए अकाल या दुर्भिक्ष के दिनों में भंडारस्यूं पट्टी का ही सहारा होता था, और यहां से दूसरी जगहों को अनाज की मदद पहुंचाई जाती थी । कुरमोला गाड के प्रवाह क्षेत्र में भंडारस्यूं के सेरे आज भी दिलकश नजर आते हैं।

टिहरी जिले में भिलंगना और उसकी सहायक नदियों के किनारे थाती कठूड़, चमियाला, केमर बासर और घनसाली में भी सेरों की लंबी श्ऱंख्लाएं हैं। लेकिन इस जिले में सबसे महत्वपूर्ण है हेंवल घाटी। जहां बीज बचाओ आंदोलन जैसी अनूठी मुहिम दशकों से चल रही है। यही वजह है कि चंबा से जाजल के बीच नागणी के इन सेरों में 30 से 35 धान की किस्में आज भी बोई और संरक्षित की जा रही हैं। यहां के किसानों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने परंपरागत खेती को लेकर देश दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

ऋषिकेश के निकट तपोवन क्षेत्र में अब कंक्रीट का जंगल उग आया है। लेकिन अब भी खेत नजर आ जाते हैं। जो कभी बासमती के लिए प्रसिद्ध थे। ऐतिहासिक जानकारी के मुताबिक इस सेरे को पाने के लिए हिमांचल का सिरमौर राजवंश गढ़राज्य में तनातनी भी हो गई थी। पौड़ी जिले के भाबर इलाके में देखें तो यहां का भावरी चावल प्रसिद्ध रहा है। इस चावल की अत्यधिक उपज के कारण ही कोटद्वार और इसके आस पास लोग बसते गए। लिहाजा खेती की जमीन भी अब सिमट कर रह गई है।

फिलहाल समय बदला है, लोगों की जरूरतें और प्राथमिकताएं बदली हैं, अब खेत बंजर हैं, जलस्रोत कम हो चले हैं और जंगली जानवरों के कहर से किसान परेशान हैं। लेकिन ये इतनी बड़ी समस्या नहीं है जितनी हमारे पुरखों ने पहाड़ों की पीठ काटते हुए झेली होंगी। बिना आधुनिक संसाधनों के खेतों के लिए पानी का रुख मोड़ना, औजार जुटाना, पशुओं की देखरेख, खाद का इंतजाम और मीलों तक खेतों की कतार तैयार करना आसान तो नहीं रहा होगा।

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