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Wednesday, April 21, 2021
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तृतीय केदार भगवान तुंगनाथ धाम के खुले कपाट

चोपता। तृतीय केदार भगवान तुंगनाथ बाबा के कपाट आज परंपरागत विधि-विधान के साथ प्रात: 11 बजे ग्रीष्मकाल के लिए खोल दिए गए।

कोरोना महामारी के चलते कपाट खुलने के समय मंदिर के पुजारी व समिति के सीमित लोग मौजूद रहे। इस दौरान शारीरिक दूरी का पालन किया गया।

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मक्कूमठ। तृतीय केदार भगवान तुंगनाथ जी के कपाट आगामी 20 मई को ग्रीष्मकाल के लिए खोल दिए जाएंगे। इसके लिए प्रक्रिया आज शीतकालीन गद्दी स्थल मक्कूमठ में शुरू हो गई। लॉकडाउन के चलते पूजा पाठ में शारीरिक दूरी का पूरा ख्याल रखा गया। मंदिर समिति द्वारा सीमित लोगों को ही इस प्रक्रिया में सम्मिलित किया गया।

आज प्रात: 8 बजे से विधि-विधान के साथ पूजा अर्चना के बाद भगवान तुंगनाथ जी की चल उत्सव विग्रह डोली शीतकालीन गद्दीस्थल मार्कंडेय मंदिर मक्कूमठ से तुंगनाथ धाम के लिए रवाना हो गई। डोली का आज रात्रि विश्राम भूतनाथ मंदिर में होगा। इसके बाद 19 मई को डोली चोपता पहुंचेगी। 20 मई को तुंगनाथ धाम के कपाट विधि-विधान के साथ ग्रीष्मकाल के लिए खोल दिए जाएंगे।

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आज सुबह मंदिर के पुजारी परंपरा के अनुसार महाभिषेक, भोग और आरती के पश्चात गर्भगृह से भोगमूर्ति को सभा मंडप में लाए। इसके बाद धार्मिक परंपराओं का निर्वहन करते हुए मूर्ति को चल उत्सव विग्रह डोली में विराजमान किया गया।
इसके बाद, नये अनाज का स्थानीय आराध्य को भोग लगाया गया।

मंदिर के पुजारी प्रकाश मैठाणी ने बताया कि कोरोना महामारी के चलते जारी लॉकडाउन के कारण प्रशासन के निर्देश पर डोली कार्यक्रम में आज सीमित लोग ही शामिल किए गए। धाम के मठाधिपति रामप्रसाद मैठाणी ने बताया कि डोली के धाम तक पहुंचने और कपाट खोलने संबंधी सभी तैयारियां पूर्ण कर ली गई हैं।

पहली बार सूक्ष्म रूप में हुई पौंणखी

प्राचीन परंपरा के अनुसार तुंगनाथ भगवान जी की डोली जब मक्कूमठ से तुंगनाथ धाम के लिए रवाना होती है तो उस दिन गांव में पौंणखी का आयोजन किया जाता है।

पौंणखी की यह अनोखी परंपरा सदियों पुरानी है। इसके तहत गांव के हर एक परिवार द्वारा भगवान तुंगनाथ जी को भोग लगाया जाता है। ग्रामीण गांव के एक खेत में एकत्रित होकर हर परिवार भगवान के भोग के लिए पूड़ी, पकोड़ी आदि पकवान तैयार करते हैं।

इसके बाद भगवान को भोग लगाने के पश्चात उसे प्रसाद के तौर पर बांटा जाता है। इस बार कोरोना महामारी के चलते सूक्ष्म ढंग से इसका निर्वहन किया गया। गांव के सीमित लोगों के द्वारा ही इस परंपरा को निभाया गया।

बता दें कि इस गांव में इस आयोजन में शामिल होने के लिए गांव के प्रवासी लोग दूर-दूर से यहां पहुंचते हैं।

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