कुम्भ मेला : अखाड़ों में छावनियों के बाहर बने हवन-कुण्डों से महक रहा धर्मनगरी का पर्यावरण

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कुम्भ मेला : अखाड़ों में छावनियों के बाहर बने हवन-कुण्डों से महक रहा धर्मनगरी का पर्यावरण

हरिद्वार कुंभ मेले के लिए अखाड़ों की ओर से बनाई गई छावनियों के बाहर बने हवन-कुण्डों से धर्मनगरी का पर्यावरण भी महक रहा है। दिन निकलते ही शाम तक संत हवन शुरू करते हैं। इसमें डाले जानी वाली सामग्री से उठ रहा सुगंधित धुआं वातावरण को महका रहा है।

सरकार की ओर से भले ही महाकुंभ शुरू करने के लिए अधिकारिक सूचना एक अप्रैल से जारी की जाएगी। लेकिन पेशवाई निकालने बाद कुंभ पहुंचे अखाड़ों ने छावनियों के बाहर हवन यज्ञ शुरू कर दिए हैं। धर्मनगरी क्षेत्र में काफी संख्या में छावनियां और बैरागी कैंप हैं।

हवन-कुण्डों में संन्यासी चंदन चूरा, आम, कई प्रकार की दिव्य लकड़ियां, काले व सफेद तिल, गूगल, हवन सामग्री, लोबान, कपूर, शुद्ध देसी घी आदि डालते हैं। निरंजनी अखाड़े की छावनी, मायादेवी मंदिर परिसर में बनी अग्नि व आह्वान अखाड़े की छावनी, सेवा सदन इंटर कॉलेज के प्रांगण में जूना अखाड़ा, कनखल में बनी महानिर्वाणी अखाड़े छावनी के लगभग दो सौ शिविरों के बाहर हवन कुण्ड बने हैं।

इसके अलावा बैरागी कैंप व अन्य स्थानों में भी साधु-संतों की ओर से हवन यज्ञ किए जा रहे हैं। हवन करने के दौरान उठने वाला धुआं शहर की आबोहवा में घुलकर शहरवासियों को पर्यावरणीय ऊर्जा दे रहा है।

छावनियों के शिविर के बाहर बनाए गए हवन कुण्डों में प्रतिदिन एक हवन-कुण्ड में हवन, यज्ञ किए जाने से हर दिन सात सौ से एक किलोग्राम सामग्री लगती है। इसके अलावा मुख्य हवन कुण्ड में हवन पहले से ही चल रहा है। अगर लगभग दो सौ हवन कुण्डों की बात करें तो कुंभ मेले में अखाड़ों की ओर से ही दो सौ किलोग्राम सामग्री की अतिरिक्त खपत बढ़ जा रही है।

नागा संन्यासी हरिओम गिरि ने बताया कि कुंभ में हवन-यज्ञ करने से बहुत ही धार्मिक लाभ मिलता है। हवन कुण्ड से निकलने वाला धुआं दूर-दूर के क्षेत्र को महका देता है। इससे मन तरोताजा हो जाता है और प्रदूषण को कम करने में काफी मदद करता है।

वहीं, महाकुंभ मेले में आए साधु-संत और नागा बाबा अपनी-अपनी परंपरा के अनुसार तपस्या में लीन हैं। गंगा किनारे चिलचिलाती धूप में नागा बाबा गर्म रेत पर अग्नि के घेरे में बैठकर तपस्या में लीन हैं। नागा बाबाओं का कहना है कि वह अपने गुरुओं की परंपराओं को आगे बढ़ा रहे हैं।

12 साल की तपस्या में लीन पांच नागा बाबा अलग-अलग मौसम में रहकर तपस्या कर रहे हैं। गर्मी में गर्म रेत पर बैठकर चारों तरफ अग्नि का घेरा बनाकर, सर्दी में पानी में खड़े होकर और बरसात में पेड़ के नीचे बैठकर यह साधु तपस्या करते हैं।

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