डा. महेश भट्ट
(सर्जन, लेखक, सार्वजनिक स्वास्थ्य सलाहकार) एमडी एमएमबीएचएस ट्रस्ट एवं अध्यक्ष विज्ञान भारती, उत्तराखण्ड
कोरोना वैश्विक महामारी से बचने के उपाय अब तक हम सभी लोगों को पता चल गये हैं। विभिन्न माध्यमों द्वारा यह बताया जा रहा है कि हमको शारीरिक दूरी के नियमों का पालन करना होगा, जिसमें कि कम से कम दो गज की दूरी आपस में बनाये रखनी होगी, जब जरूरी हो तभी बाहर निकलना चाहिए, मास्क पहनना चाहिए, इधर उधर थूकना नहीं चाहिए, और हाथों को धुलते रहना चाहिए विशेष रूप से जब कहीं से आयें, या फिर जब कोई बाहरी वस्तु को छुएं इत्यादि। इसके साथ ही साथ हम ये भी जान गए हैं कि ये बीमारी एक वायरस की वजह से हो रही है जिसकी कोई दवा अभी उपलब्ध नहीं है और पूरा विश्व इस बीमारी की चपेट में है। इसके टीके एवं इसकी दवाई की खोज पर भी भारत सहित पूरे विश्व में काम तेजी से चल रहा है ये सब पिछले काफी समय से मीडिया में बताया जा रहा है।

आज यहां हम कुछ ऐसी जानकारियों पर बात करेंगे जो अब तक के विश्वभर के डेटा से हमको उपलब्ध हो रही है, पहली बात तो ये है कि इस बीमारी में एक अच्छी खासी तादाद में (लगभग 70 से 80 प्रतिशत) लोग बहुत मामूली लक्षणों या बिना किसी लक्षण के ठीक हो रहे हैं, केवल 10 से 15 प्रतिशत लोगों में ही सामान्य लक्षण जैसे कि बुखार, जुकाम या खांसी की तरह के लक्षण दिख रहे हैं, तथा ऐसे संक्रमित लोगों की संख्या बहुत कम है जिनको गम्भीर लक्षण जैसे कि सांस लेने में तकलीफ, बहुत खांसी या फिर निमोनिया हो रहा है जहां उनको सघन चिकित्सा की जरूरत हो। अब तक के अध्ययन हमको ये इंगित कर रहे हैं कि कोरोना वायरस की मारक क्षमता से ज्यादा समस्या इसकी संक्रामकता से है, ये तेजी से लोगों को संक्रमित कर रहा है, तथा साथ ही साथ बहुत बार जिस व्यक्ति में संक्रमण है उसको ही नहीं पता कि वो संक्रमित है, क्योंकि उसको कोई लक्षण ही नहीं है।

इन परिस्थितियों में टीका ही एक वाजिब विकल्प हो सकता है जिसको आने में अभी लगभग एक से डेढ़ साल लग सकता है, हालांकि कुछ जगहों पर चल रहे परीक्षणों से इसके पहले आने की भी उम्मीद जगी है, पर फिर भी अभी इस दिशा में बहुत कुछ कहना मुश्किल है। लॉकडाउन इस बीमारी से बचने का दीर्घकालिक उपाय नहीं हो सकता, हमारे देश में लॉकडाउन की विभीषिका हम अब देखने लगे हैं जहां लाखों मजदूर अपने-अपने गांवों को बड़ी अमानवीय त्रासदी से जूझते हुए हजारों किलोमीटर की दूरी पैदल ही नापने को मजबूर हैं, इसके अलावा कई अन्य बीमारियों से पीडि़त मरीजों एवं उनके सगे सम्बन्धियों को भी कई समस्याओं से जूझना पड़ रहा है, उनको इलाज मिलने में कई दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, यही नहीं लॉकडाउन लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी बहुत बुरा असर डाल रहा है, अर्थव्यवस्था का तो बुरा हाल है ही, अत: लॉकडाउन इस वैश्विक महामारी का हमारे जैसे देश के लिये एक सीमा से ज्यादा बढ़ाना महामारी से ज्यादा भयावह परिणाम का सबब बन सकता है।

तो अब प्रश्न उठता है कि हम क्या करें? पहली बात तो ये पक्की है कि न चाहते हुए भी अगले कुछ महीनों या सालों तक हमको इस विषाणु के साथ रहना होगा, इसके लिये हमको अपनी जीवन शैली में इस वायरस से बचने के तौर तरीकों को शामिल करना होगा, दूसरा इससे भयभीत होकर कोई फायदा नहीं है, यदि हम उन ऐहतियाती कदमों को अपना लें जो आजकल स्वास्थ्य विभाग तथा विश्व स्वास्थ्य संगठन हम को बता रहे हैं और जिनका जिक्र इस लेख के शुरू में किया गया है, तो हम इस महामारी से बच सकते हैं, कुछ देशों ने ये कर भी दिखाया है।

इसके साथ ही साथ हमको ये समझने की जरूरत है कि जीवन के हर क्षेत्र में, धर्म के पालन में भी, विज्ञान सम्मत व्यवहार अपनाना इस वायरस ने हमको सिखाया है, क्योंकि ये जब संक्रमित करता है तो धर्म, वर्ग, जाति बिल्कुल नहीं देखता, वो सिर्फ मनुष्य को पहचानता है। तीसरा उपाय ऐसे समय पर अनेकों प्रकार के उपचारों की झड़ी लग जाती है। सोशल मीडिया में कई प्रकार की बे सिर पैर की बातें होने लगती हैं। एक अध्ययन में पाया गया है कि इस महामारी के दौरान अस्सी प्रतिशत तक भ्रामक जानकारियां सोशल मीडिया में चल रही थी, अत: हमको उनसे और उनके प्रभाव से बचने की बहुत जरूरत है।

कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि कुछ सतर्कताओं के साथ बिना भयभीत हुए सही जानकारी हम को इस महामारी में विजयी बना सकती है।

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