चंपावत। जिले के देवीधुरा स्थित प्रसिद्ध मां बाराही धाम में इस बार लोग बगवाल मेले का आनंद नहीं ले पाएंगे। वैश्विक महामारी कोरोना के चलते यहां पर वर्षों पुरानी बगवाल की परंपरा और रोमांच लोगों को इस बार देखने को नहीं मिलेगा। तीन अगस्त का सिर्फ प्रतीकात्मक रूप में पूजा-अर्चना कर बगवाल की रस्म अदायगी की जाएगी।

मालूम हो कि यहां पर बगवाल हर साल रक्षाबंधन के दिन होती है। इस बार 03 अगस्त को बगवाल होनी थी, मगर कोरोना महामारी के चलते बीती 28 जून को बगवाल स्थगित करने का निर्णय लिया गया। जिस पर प्रतीकात्मक रूप से होने वाली पूजा-अर्चना पर अंतिम मोहर लगाई गई।

देवीधुरा में ग्रामीणों के साथ बैठक में चारों खाम और सातों थोक के प्रतिनिधियों ने बगवाल मेले के बजाय सिर्फ रस्म को पूरा करने के तरीकों पर जोर दिया। मंदिर समिति अध्यक्ष खीम सिंह लमगड़िया की अध्यक्षता में हुई बैठक में सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताओं को शारीरिक दूरी के साथ प्रतीकात्मक रूप से पूरा किया जाएगा। हर खाम के तीन-चार प्रतिनिधि एक साथ मां बाराही देवी की पूजा-अर्चना कर बगवाल के स्थान पर हर खाम एक-एक फर्रे के साथ बारी-बारी से परिक्रमा करेगा। निर्णय लिया गया कि यह संख्या भी दस से अधिक नहीं होगी।

तय किया गया कि पूजा-अर्चना व मंदिर की परिक्रमा करने के बाद यह बगवाली वीर अपने घरों को चले जाएंगे। पिछले सालों तक लगने वाले बाहरी कारोबारियों के साथ ही बाहरी लोगों को अपवाद स्वरूप परिस्थितियों को छोड़ पूजन पर रोक रहेगी। साथ ही बाहरी लोगों को रोकने के लिए प्रशासन से निवेदन किया गया है।

खामों के मुखिया बद्री सिंह बिष्ट, वीरेंद्र सिंह लमगड़िया, गंगा सिंह, त्रिलोक सिंह बिष्ट, हयात सिंह बिष्ट, रमेश राणा, त्रिलोक सिंह, रोशन सिंह, मदन बोरा, दीपक चम्याल, राजू बिष्ट, बिशन सिंह, ईश्वर बिष्ट, नवीन राणा, दीपक बिष्ट, दिनेश चम्याल, मोहन सिंह, तारा सिंह, गोकुल कोहली, प्रकाश महरा, लाल सिंह, रमेश राम आदि मौजूद थे।

कैसे हुई रक्षाबंधन को बगवाल की परंपरा शुरू

क्षेत्र के चार प्रमुख खाम लमगड़िया, चम्याल, वालिग और गहरवाल खाम के लोग पूर्णिमा के दिन विधिवत रूप से पूजा-अर्चना करने के बाद फल-फूलों से बगवाल खेलते हैं। इसके पीछे यह मान्यता है कि पूर्व में यहां नरबलि दी जाती थी। एक बार जब चम्याल खाम की एक वृद्धा के अकेले पौत्र की बलि के लिए बारी आई, तो वंशनाश के डर से उस बुजुर्ग महिला ने मां बाराही की कड़ी तपस्या की। बुजुर्ग महिला की कठोर तपस्या से देवी मां प्रसन्न हुई। देवी मां के प्रसन्न होने पर उस वृद्धा की सलाह पर चारों खामों ने आपस में युद्ध कर मां बाराही धाम मंदिर के खोलीखांड दुबाचैड़ में बगवाल की परंपरा को शुरू किया। तभी से ही बगवाल का सिलसिला चला आ रहा है।

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