13.1 C
Dehradun
Monday, December 6, 2021
Homeकला एवं संस्कृतिखांकरा-लाटू की जात: धैन-चैन संरक्षा की अनमोल परंपरा

खांकरा-लाटू की जात: धैन-चैन संरक्षा की अनमोल परंपरा

गजेंद्र नौटियाल
सीमांत जनपद चमोली का विकासखंड शिव-पार्वती से जुड़े जनसरोकारों का अनमोल परंपरा वाला क्षेत्र है। यहां पाथावार नंदा की वार्षिक पाती गैरसैंण और आस-पास होती है तो कृष्ण-गंगा की वार्षिक पाती का आयोजन भी होता है जिसमें नंदा भूम्याळ ईष्ट के रुप में स्वत:शामिल होती है।

छिमटा के राज रुडिय़ा नंदाराजजात की छंतोली बनाते हैं तो चांदपुर गढ़ी के राजाओं ने ही राजजात की परंपरा शुरु की होने की परम्परांए पल्वित होती रही हैं। गैरसैंण के पास ही बूढ़े शिव-पार्वती का मेला हर चैत्र संक्रांति को होता है। गैरसैंण के ऊपर जंगलों में शिव का जगह-जगह निवास है जो यहां के पशुचारक के लोकदेवता के रुप में किंवदंतियों में वास करता है।

हर 12 साल में शिव को यहां से 34 किलो मीटर भब्य जात्रा के साथ खांकराखेत जा कर हिमालय के लिए शिव की विदाई के रुप में मनाई जाती है। यहां विश्वास है कि 12वें वर्ष हिमालय विदाई के बावजूद शिव उनके सहचर के रुप में पशुचारक भेष में हमेषा निवास करते हैं। मान्यताओं के इसी एहसास के साथ यहां एक अनमोल परंपर हर साल परवान चढ़ती है खांकरा-लाटू की जात्रा।

खांकरा-लाटू की जात्रा मूलत: पशुचारकों की अपने सहचर ईष्ट शिव और लाटू के साथ ही आठ अन्य देवताओं की धैन-चैन के लिए पूजा-धन्यवाद की जात्रा है जिसके निमित्त प्रकृति और परायण का संयोग अनायास ही साथ हो जाता है।
गैरसैण चौखुटिया मार्ग पर आगरचट्टी से 4 किलोमीटर सीधी चढ़ाई पर बसा गांव है स्यूंणी मल्ली यहां 18 वीं शताब्दी में बने शिवालय में शिव अर्धनारीश्वर स्वरुप में निवास करते बताये जाते हैं।

गांव से ऊपर घने रंसुळ-देवदार बांज-बुरांस के सदाबहार घने जंगलों के बीच 5 पड़ावों पर 16 किलोमीटर की यात्रा 7 जलधाराओं को पार कर ब्यासी के मैदानों में पंहुचती है। यात्रा श्रावण शुक्लपक्ष 9 गते को सुबह गांव के पास ब्यास नदी में स्नान करने के बाद देव पश्वा सफेद टोपी-पगड़ी पजामा पहन कर देवखाळी में एकत्र होते हैं।

पंचनाम देवताओं की पूजा कर माथे पर पीले च्यूदाळ धारण कर यात्रा पैटाते हैं। खांकरा शिव, लाटू की अग्वानी में हीत, नगरकंण्डी लाटू, दानू, दुधाकुंण्डी दानू, नागार्जुन, दानू, विनसर, घंडियाल, भगोती, देवा माई 10 देवी-देवताओं के न्यूज-निसांणों और गाजे बाजों के साथ जात्रा आगे बढ़ती है।

यात्रा का पहला पड़ाव गांव के ठीक ऊपर 3 किलोमीटर चढ़ाई के बाद ”नौणी खाता में रुकती है। यहां देव निसांणों को अर्ध अर्पित कर माखन का भोग लगाते हैं। दूसरा पड़ाव घिंघारु खाता में देवदर्शन हिमालय को देखते हैं और वायुस्नान के बाद भिड्यासैंण की तरफ बढ़ती है।

भिड्यासैंण में विश्राम कर देवजात्रा 3 जल धारांओं के पार ठृल्लासैंण में काठ-पात पर शयन कर विश्राम करते हैं। दिन में भी सूर्य किरणों से परे इस घने जंगलों में काठ-पात की पूजा स्वाभाविक अनुभूतियों को आस्था से जोड़ जाती है।
खांकरा खाळी में फिर पशुचारक देव यात्रा की अगवानी कर विश्राम का आग्रह कर जागर गायन कर देवताओं को धैन-चैन के लिए धन्यवाद देते हैं।

यहां से 7 जलधारों का सफर खतम होता है और पशुचारकों की छानियो का सिल-सिला शुरु होता है। यात्रा का रात्रि पड़ाव गोपालु खाता है जहां जात्रियों के लिए खुले आसमान के तले हरी घास के मैदान पर भोग की ब्यवस्था होती है। यहां एक महिने से भात बनाना प्रतिबंधित रहता है और ताजे दूध सिर्फ दस नाम देवताओं को चढ़ता है पशुचारक बासी दूध ही सेवन करते हैं।

सभी पड़ाओं पर छानियों के आस पास जंगलों में सैकड़ों वर्षाती खाळ-चाल बनाई गई हैं। इनमें इकठ्ठे पानी से पाल्या पशु प्यास बुझाते हैं और यही पानी रिसकर निचे घाटियों में पानी के स्रोतों को पानी पंहुचाता है। आस-पास नमी से जंगल में जैवविविधता बरकरार रहती है तो जंगली जानवर भी इसी पानी का उपयोग करते हैं। इस यात्रा में पहाड़ों में पशुचारण और जल-जंगल जीव के असली अंर्तसम्बंधों का एहसास होता है।

यात्रा का रात्रि पड़ाव मुख्य मंदिरों से 1 किलोमीटर पहले ब्यासी की छानियों के पास होता है जहां रात्रि विश्राम के लिए लोग बड़े पेड़-झुरमुटों पर बर्षाती लगाकर मखमली घास पर रात्रि विश्राम करते हैं। रात होने से पहले ही भोज लम्बी कतारों में खाया जाता है और रातभर नंदा, खांकरा महादेव, लाटू आदि 10 देवताओं के लोक जागर गीत गा कर जागरण किया जाता है और तड़के नित्य क्रमों से निवृत हो कर स्नान ध्यान के बाद सभी देवता के निसाण जात के अग्वान हीत की थान ”ब्रह्मशिला पर हीत पश्वा के पास जाकर आगे बढऩे की अनुमति लेते हैं।

देवानुमति के साथ देव पश्वा अपने निसाण-ध्वजा के साथ घने जंगलों के बीच से चलकर राजब्यासी टाप पर जाते हैं जहां लाटू और खांकरा महादेव के मंदिरों में पहले पूजा होती है। इसके बाद दुधाकुण्डी लाटू को दूध स्नान, ”सांगळसैंणमें खांकरा-भगौती की सांकळ की पूजा होती है। लोहे की सांकल कहा जाता है कि हिंसक जंगली जानवर बाघ-शेर, भालू आदि को बंधन में बांधे रखती है और जब पेड़ से इसका बंधन स्वयं खुल जाये तो पशुचारकों को संकेत होता है कि वे अब इस जंगल छोड़कर नीचे गांवों में चले जांय। सांकल बंद रहने तक किसी भी जानवर को हिंसक पशु नुकसान नहीं पंहुचा पाता।

राजब्यासी के नीच ही नागार्जुन दाणु आदि के मंदिर हैं जिनकी पूजा अर्चना के बाद सभी देवताओं को भोज देकर यात्रियों को भोग परोसा जाता है। खीर, परसाद(आटा का हलवा) और बली चढ़ाये गये दर्जनों बकरों के भितर्वांस(आंत, कलेजी,फेफड़े की भूनी) पुरी के साथ परोसी जाती है और लोग देव जात्रा के साथ अपने गांवों की ओर प्रस्थान करते हैं।
यात्रा में पूजे जाने वाले देवताओं के बारे में जात आयोजन समिति के सचिव देवेन्द्र सिंह बताते हैं कि सभी देव-देवियों को अपने सहचर जैसे अलग-अलग काम बंटे हुए हैं।

खिांकरा शिव इन देवों का मुखिया और भगोती मुखिया है, लाटू भूमि की रक्षा करता है, हीत किसी भी आयोजन का अग्वान और आयोजक है, नगरकंण्डी लाटू गांव की रक्षा करता है ओले से बचाव भी इसी देवता के जिम्मे बताते हैं, दानू चूहो, चिडिय़ों से फसल बचाता है, दुधाकुंण्डी दानू पशुओं की सेहत का रक्षक है तो दिवामाई भैंसों की रखवाली करती है, नागार्जुन पशु और दन्सानों को बीमारियों से बचाता है, विनसर लोहा-लकड़ से वरकत का देवता यानी खेती किसाणी का देव है घंडियाल अनाज में बरकत का देवाता है।

पुरातन मान्यताओं को मनाने पशुचारकों का ये घने जंगलों में प्रकृति के साथ मनाया जाने वाला मेला अलौकिक शक्तियों के साथ साक्षात्कार का मौका भी है जिसमें प्रश्न और संशय के बिना हर पीढ़ी का यात्री अपने-अपने निहितार्थ तलाश ही लेता है। आज आवश्यकता है तो बस यही कि इस तरह के अलौकिक परंपराओं को संरक्षण देने के लिए सरकारें भी अपने निहितार्थ समय रहते तलाशे ताकि ये जात्रांए अपने लिए निहित उदेश्यों के साथ जारी रह सकें।

RELATED ARTICLES

Leave a reply

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
- Advertisment -
- Advertisment -
- Advertisment -
- Advertisment -
- Advertisment -

Most Popular

- Advertisment -

Recent Comments

error: Content is protected !!